Poem

तारीफ

जब तू मिली थी मुझसे पहली बार I

मैंने तारीफो की बना दी थी तेरी कहानिया हज़ार II

एक दिया था तुझे लफ्जों का हूर I

उसी वक़्त मैंने तारीफो में कहा था तुझे कोहिनूर II

तू जीना सिखा रही थी मुझे I

मैं मोहब्बत में मरने लग गया तुझपे II

लत लगाली मैंने खुद को तेरी I

उसी दिन से बनी तू कमजोरी मेरी II

चाहता था बहुत मै तुझे I

कई बार कहा भी मैंने तुझसे II

फिर सोंच कर हमारी दोस्ती का हाल I

मैंने बदल दिए बातों को देके तुझे एक बेकार सी मिसाल II

अब मै टुटा हूँ I

शयद तुझसे रूठा हूँ II

मनाले मुझे आके एक बार I

करले तु मुझसे थोड़ा सा प्यार II

देदे मुझे कोई आस I

ताकि मुझमें जीने के लिए बची रहे साँस II

वो जो मै तेरी बेवजह तारीफ करता हूँ वो सिर्फ लफ्ज़ नहीं हालत है मेरे दिलके I

कम्बक्त तुझे क्यों कुछ भी पता नहीं चला दूजी बार मुझसे मिलके II

मै चला गया बिना तेरी तारीफ किये उस महफ़िल से I

फिर भी कुछ आवाज़ न निकली तेरे दिल से II

अब मै टुटा हूँ I

शयद तुझसे रूठा हूँ II

मनाले मुझे आके एक बार I

करले तु मुझसे थोड़ा सा प्यार II

जब जब शाम ढलेगी मुझे तेरी कमी खलेगी I

आऊंगा मैं तेरे पास बनके तेरी धडकनों की साँस II

फिर करूँगा जी भर के तेरी तारीफ, लुँगा तेरे दिल का हाल I

फिर लौट जाऊंगा अपने घर की ओर बिना सुनाये तुझे अपने दिल का ख्याल II

अब बस आखरी ख्वाहिश है ये मेरी की जीलूँ तेरे साथ I

करदूँ मै कुछ पल और तेरी तारीफ और मर जाऊं लेके अपने हाथों में तेरा हाथ II

और मर जाऊं लेके अपने हाथों में तेरा हाथ II

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