Society

यह भी मा है

समाज में कुछ कहानी ऐसी घटित होती हैं जिससे मन उद्वेलित हो जाता है। जिस देश में माताएं अपने पुत्र को सुरक्षित रखने हेतु अपने सुहाग तक की भी बली चढ़ा देती थी उस देश में अब माता अपनी जिंदगी को खुशनुमा बनाने के लिए अपनी जाया से ऐसे मुंह मोड़ रही है जैसे कसाई बकरे से मोड़ लेता है। भौतिकता की चकाचौंध से समाज में परिवार के बदले व्यक्ति सर्वोपरि बनता जा रहा है। ऐसा माना जाता है कि बच्चे का बाप यदि मर जाए तो बच्चा अनाथ अवश्य हो जाता है लेकिन ममता की छांव में उसका जीवन संवर जाता है। मा हमेशा उसको अपने सीने से लगाए रखती है वह खुद भूखी-प्यासी रहती लेकिन अपने तनय पर कष्ट का एक दंश भी बर्दाश्त नहीं करती । वही मां जब अपने उस कलेजे के टुकड़े को असहाय छोड़ जाय तो उसे क्या कहेंगे। आईए आज ऐसे ही एक कहानी आप को सुनाता हूं।
अचानक से खबर आई कि गुड्डू चौधरी नहीं रहा तो पुरे गांव में शोक छा गया। किसी को यह विश्वास ही नहीं हो रहा था कि हमेशा हंसता मुस्कुराता समाज में सबों के काम आने वाला दो छोटे छोटे मासूम बच्चों का बाप गुड्डू अब नहीं रहा। पुरा समाज चौधरी परिवार के दुःख से गमगीन था। गुड्डू के पिता रामानंद चौधरी को सभी धीरज बंधाते। महिलाओं का झुंड गुड्डू चौधरी की पत्नी की चित्कार को देख शोकित हो जाता, देखने वालों के आंसु टपकने लगते। जगह-जगह चौधरी परिवार की ही चर्चा होने लगती। महिलाओं में यह विशेष चर्चा होती। शर्मा चाची कहती भगवान बहुत बड़का अनयाय कैरि देलकैय, दोनो बच्चा बिलल्ला (अनाथ)होय गेलय। बुआरी बाली कहती हे …., बच्चा त कोनो तरह से पोसाईए जयतय मुदा कनिया के की होतय, सोचय छ (बच्चो का तो किसी प्रकार पालन हो ही जाएगा लेकिन गुड्डू की पत्नी का क्या होगा)। इस बात पर अन्य सभी महिलाएं हां में हां मिलाती। कसबा बाली कहती सुडडू भी कुंवारा नय छय जे ओकरे संग में दोबारा………….(सुडडू भी कुंवारा नहीं है जो विधवा का उसके साथ पुनर्विवाह हो जाय )। टुनमा माय कहती बेचारी पर मुसिबत का पहाड़ टूट गया है। धीरे धीरे यह चर्चा भी थम गई।
दो बरस बाद अचानक एक दिन यह खबर आई कि गुड्डू चौधरी की पत्नी अपने यार के साथ भाग गई। खबर रोमांटिक एवं आश्चर्यजनक था सो जंगल की आग की भांति पुरे गांव में फैल गई। लोग मजमा लगा लगाकर इस पर रस लेने लगे। परंपरावादी इसे गलत मानते तो आधुनिकतावादी इसे उचित ठहराते।
मर्दों की टोली में चर्चा होने लगी– माखन कहता “रमेश चा देखे न चौधरिया को , बहुत दुसरे को ज्ञान बांटता था अब क्या हो गया” । ज्ञानी कहता- “भैया, दूसरे को उपदेश देना तो बड़ा सरल है लेकिन अपने पर लागू करना बहुत मुश्किल है ,यही हाल है चौधरी जी का” । उधर अवधेश बाबु कहते- ‘मुखिया जी, गांव का माहौल खराब हो गया जल्दी कुछ करिए सबके घर में बहु-बेटी है”। शर्माजी समझाते “देखो, गलत तो हुआ है लेकिन मैला को जादा मत गीजो , जितना गिजोगे उतना बदबू करेगा इसलिए उसपर मिट्टी ढक देना चाहिए”। नशे में झूमता हुआ मुरली कहता- “भाग गई तो भाग गई, किसी के बाप का क्या ले गई, जवान जहान थी, दो साल से तो यहां थी, कौन उसको देखने गया, बड़ा समाज की चिंता करते हैं”। ठेकेदार बनते हैं करना-धरना कुछ नहीं खाली सब भाषण देता है।
उधर महिलाओं की महफ़िल सजती। माला वाली कहती-” हरजाई, चांद सूरज जैसन दोनों बेटो के भी ख्याल नय करलकय(चांद सूरज जैसे दोनों बेटा का भी ख्याल नहीं की)। बुढ़िया दादी कहती- भैर जबानी मे हमरो चुड़ी टुटलय, टुनमा दु साल के रहैय लेकिन रहलिए न यहीं ठां कोनो अंगुली नय उठलकै (भरी जवानी में मेरी चुड़ी टूट गई बेटा टुनमा दो साल का था उस समय से इसी गांव में रही लेकिन किसी ने मेरा चरितलांछन नहीं किया)। हसनगंज वाली कहती चाची हे, ई शुरूए के बहकल रहै ।यहा कारण दौर दौर के नैहरा भागे रहै (यह औरत शुरू से ही गलत थी इसी कारण बार बार मैके भागती थी)। कोहिला वाली कहती सहिए बोलय छ दीदी,लागै छय गुडुआ देख नेने हैते बेचारा केकरो नय बोल सकलकय और यही सदमा में प्राण गवांय देलकैय(सही बोल रही है दीदी, लगता है कि गुड्डू देख लिया होगा यह बात बेचारा किसी से बोल नहीं पाया और इसी सदमा में वह मर गया)। लेकिन बीए में पढ़ने वाली पिंकी कहती कि भाभी ने कुछ भी गलत नहीं किया है, जरा सोचिए पुरी जिंदगी बची थी कोई सहारा भी नहीं था। जितनी मुंह उतनी बातें। जैसा कि होता है धीरे धीरे इस चर्चा को भी विराम लग गया।कुछ दिनों बाद मेरा भी स्थानांतरण दरभंगा हो गया।
पांच वर्ष बाद एक काम के सिलसिले में मुझको पुर्णिया आना पड़ा । अचानक मेरी गाड़ी खराब हो गई। एक गैरेज में उसे ठीक करवा रहा था। मेरी नजर बार-बार एक 14 -15 वर्षीय किशोर पर ठहर जा रही थी। गोरा चिट्टा चेहरा, कपड़े फटे हुए चेहरे पर मोबिल का छिंटा और हाथ में एक लोहे का रड। मेरी नजर बार-बार उसे पहचानने का असफल प्रयास कर रही थी। जब रहा नहीं गया तो मैंने इशारा देकर उसे बुलाया। मेरा इशारा पाते ही वह दौरा मेरे पास आया और मुझे प्रणाम किया। मैंने उससे पूछा कि तुम कौन हो? तपाक से बोला “सर- आप नहीं पहचाने ! मैं सोनु, आपका छात्र।मेरा घर डगरूआ हुआ। डगरूआ सुनते ही उसके पुरे परिवार का दृश्य चलचित्र की भांति सामने आने लगा किंतु उसको इस रूप में देखकर मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह वही सोनु है, गुड्डू चौधरी का दुलारा बेटा। मैंने पूछा- ट्रक खरीदा है क्या? उसने जवाब दिया नहीं सर, मैं इसमें खलासी का काम करता हूं। यह सुनते ही मुझे बिजली के करेंट सा झटका लगने लगा। जिस रामानंद चौधरी के पास पचास बीघा जमीन, घर में दस बीस नौकर-चाकर, आज उसी चौधरी जी वही दुलारा पोता जिसके एक खिलौने की जिद ने घर में खिलौने का मेला लगा दिया था ट्रक में खलासी बन गया। मेरी उत्सुकता उसके इस हाल के बारे में जानने की हो रही थी। इसलिए मैंने उसे चाय पीने का आफर दिया । वह तैयार हो गया। सामने की दुकान में हम चाय पीने लगे। चाय पीते पीते मैंने पूछ लिया-
‘तुम ट्रक पर कैसे आए’? मेरे इतना कहते ही वह फफक उठा। कहने लगा, ‘क्या बताएं सर, आपके जाने के बाद दादा जी स्कूल का फी जमा किए लेकिन कुछ दिन के बाद चाची ने चाचा को भड़का दिया। चाचा एवं दादा में रोज झगड़ा होने लगा । चाचा, दादा से कहते सब पैसा इसी पर खर्च कर दिजीए ताकि मेरा बेटा भीख मांगे। रोज के खीचखीच से तंग आकर दादा जी ने एम्स स्कूल से नाम कटाकर कलाम हाईस्कूल में लिखवा दिया लेकिन पढ़ने का फुर्सत ही नहीं मिलता। सुबह शाम घर में झाड़ू पोंछा करता, नौ बजे स्कूल जाता, जब पढ़ने बैठता तो चाची अपने बच्चे को थमा देती। आप ही बताइए सर, बिना पढ़े परीक्षा में कोई पास कर सकता है, मैं फेल हो गया। चाचा ने मेरी खूब पिटाई की, कहते कभी पढ़ाई-लिखाई नहीं किया ई पढ़ने वाला है ही नहीं। दादाजी दुबारा मेरी परीक्षा फीस जमा करना चाहते थे लेकिन चाचा ने पूरा विरोध करना शुरू किया उधर चाची कहती पढ़ता लिखता तो है नहीं, कितना फीस भरिएगा और पोता पोती है कि नहीं। मेरी पढ़ाई छूट गई। दिन भर घर का काम करने लगा। बात बात में झिड़की मिलती, आए दिन मेरी पिटाई होने लगी। एक दिन मैं चाचा के मोबाइल को उठाकर देख रहा था कि इतने में चाची आ गई। कहने लगी चोरी करता है! और झाड़ू से पीटने लगी तब मौका देख कर घर से जो भागा इसी ट्रक में आकर रूका। ड्राइवर साहब ने मुझको भरपेट खाना खिलाया और मुझे खलासी के रूप में रख लिया। अपना मोबाइल दिखाते हुए कहने लगा -सर, यह मोबाइल मेरे खुद का है, मैंने अपनी कमाई से इसे खरीदा है देखिए न पूरे 5000 का है। इसी मोबाइल के कारण तो मैं घर से भागा।
मैंने पूछा- तुम्हारा एक छोटा भाई भी था न, वह कहां है? वह कहने लगा सर,” बिना मां बाप के बच्चे का कहीं ठिकाना नहीं होता है, जो हाल मेरा है वही हाल मोनू का भी है। एकदिन नाना आए, वह रोने लगा मा के पास जाने की जिद करने लगा। दादा ने उसे भिजवा दिया लेकिन यहां चाचा चाची वहां मामा मामी। वहां नानी का कुछ कृपा हुआ था इस कारण उसकी मार पिटाई तो नहीं होती लेकिन वह दुकान का नौकर बन कर रह गया”।
मां का कुछ पता चला क्या? मां का नाम सुनते ही वह ज्वालामुखी की तरह धधक उठा। सर, उसका नाम मत बोलिए, वह मा नहीं है। यहीं कचहरी में ही अपने पति के साथ काम करती है। एक दिन मैं जब परेशान हो गया तो उससे मिलने कचहरी गया मैंने सिर्फ प्रणाम किया। मुझे देखते ही उसे लगा कि मैं उसका बेटा नहीं बल्कि जानी दुश्मन हुं। बोली क्यों आए हो यहां। मैंने कहा, मम्मी ऐसे काहे बोलती हो, हम तुम्हारा कोई नहीं है क्या! देखती हो मेरा हाल, तुम्हारे जाने के बाद कोई सहारा नहीं है। भरपेट खाना भी नहीं मिलता है। कहती क्या है तुम्हारे साथ अब मेरा कोई रिश्ता नहीं है जब तुम्हारा बाप मुझको दगा दे गया तो तुम लोग के कारण मैं अपना जीवन बर्बाद कर लें! तुम अपने दादा दादी के पास जाओ और मेरे पास दोबारा कभी मत आना। अपने पर्स से ₹100 का नोट निकाल कर मुझे दी और कहने लगी जाओ खाना खा लेना। सर आप जिसे मेरी मां कह रहे हैं उसके इस वर्ताव से मैं अवाक था। मुझसे रूका भी नहीं जा रहा था। मुझको विश्वास ही नहीं हो पा रहा था कि मैं उस औरत के सामने खड़ा हूं जिसने मुझको जन्म दिया है। वह सौ रुपए का नोट मैंने उसे वापस किया और सीधा निकल गया और पहली बार दिल खोल कर बिना मार के अपनी किस्मत पर रोता रहा। अब आप ही बताइए सर, उसे किस मुंह से मम्मी बोले। मेरा तो संसार में यदि कोई है तो इस ट्रक का ड्राइवर, जिसने मुझको जीने का भरोसा दिया, भरपेट भोजन दिया। उसकी कहानी सुनकर मेरा दिल भी पसीज गया। तभी ड्राइवर ने उसे आवाज दी वह प्रणाम कर जाने लगा। साथ यह प्रार्थना किया मेरी असलियत किसी को ना बताई जाए।
उसके जाने के बाद मैं सोचने लगा कि समाज को यह क्या हो गया है।
यह देश जीजाबाई, देवकी, सीता, केकयी, कुंती जैसी माताओं का रहा है जिन्होंने अपने अपने पुत्र को सुरक्षित एवं सम्मानित करने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया आज ऐसे माताओं के देश को यह क्या रोग लग रहा है। परिवार की धुरी बनने वाली मा, सभ्य समाज का निर्माण करने वाली मा के अस्तित्व को यह ग्रहण क्यों लग रहा है। उत्तर यही मिला कि जिस पश्चिमी सभ्यता का हम नकल करना चाह रहे हैं यह उसी का परिणाम है इसलिए अब हमारे यहां वृद्धाश्रम, अनाथालय, नारी निकेतन की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। फैसला आप पर छोड़ता हूं कि भविष्य का भारत कैसा हो।

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